Biogas Plant Yojana: उत्तर प्रदेश के गोरखपुर क्षेत्र में ग्रामीण महिलाएं एक साथ दो चुनौतियों का समाधान निकाल रही हैं। वे दूध उत्पादन के जरिए नियमित आय कमा रही हैं और घरेलू ईंधन के लिए बायोगैस प्लांट अपनाकर महंगी एलपीजी गैस की किल्लत से राहत पा रही हैं। यह बदलाव उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत गठित श्री बाबा गोरखनाथ कृपा मिल्क प्रोड्यूसर्स ऑर्गनाइजेशन (MPO) की सदस्य महिलाओं के माध्यम से हो रहा है।
इस पहल से जुड़ी करीब 110 महिलाओं ने न केवल अपने परिवारों की ऊर्जा जरूरतें पूरी कर ली हैं, बल्कि जैविक खाद का उत्पादन भी शुरू कर दिया है। इससे उनकी आय बढ़ी है और पर्यावरण को भी फायदा पहुंच रहा है।
एलपीजी संकट और वैश्विक कारण
पिछले कुछ महीनों में खाड़ी क्षेत्र में बढ़े तनाव और युद्ध की वजह से भारत में एलपीजी की आपूर्ति प्रभावित हुई है। देश दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी आयातक है और अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से पूरा करता है। इन आपूर्ति व्यवधानों ने घरेलू स्तर पर गैस सिलेंडर की उपलब्धता और कीमत दोनों को प्रभावित किया।
ऐसे समय में गोरखपुर की महिलाओं का बायोगैस की ओर रुख एक व्यावहारिक और स्थानीय समाधान साबित हो रहा है। गोबर से बनी यह गैस न केवल मुफ्त और लगातार उपलब्ध है, बल्कि इसमें पारंपरिक ईंधन की तरह धुआं भी कम उत्पन्न होता है।
आजीविका मिशन और MPO का गठन
उत्तर प्रदेश सरकार की आजीविका मिशन योजना ग्रामीण महिलाओं को संगठित कर उन्हें स्थायी आजीविका प्रदान करने पर जोर देती है। इसी क्रम में गोरखपुर क्षेत्र में श्री बाबा गोरखनाथ कृपा मिल्क प्रोड्यूसर्स ऑर्गनाइजेशन (MPO) का गठन किया गया। यह संगठन मुख्य रूप से महिला दुग्ध उत्पादकों द्वारा स्वामित्व और प्रबंधित है।
संगठन की सदस्य महिलाएं दूध संग्रहण, प्रसंस्करण और विक्रय से जुड़कर आय अर्जित कर रही हैं। साथ ही, नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (NDDB) के सहयोग से उनके घरों में बायोगैस प्लांट स्थापित किए गए हैं। इन प्लांटों में घरेलू स्तर पर उपलब्ध गोबर को कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
बायोगैस प्लांट की कार्यप्रणाली और फायदे
NDDB के सहयोग से लगाए गए ये बायोगैस प्लांट घरेलू स्तर पर डिजाइन किए गए हैं। इनमें गोबर, पानी और कुछ अन्य जैविक अपशिष्ट को एनारोबिक डाइजेशन प्रक्रिया से गुजारा जाता है। इससे मीथेन गैस उत्पन्न होती है, जो खाना पकाने के काम आती है।
मुख्य फायदे इस प्रकार हैं:
- ईंधन की निरंतर उपलब्धता: एलपीजी सिलेंडर की कमी या महंगाई से मुक्ति।
- खर्च में बचत: गैस पर होने वाला मासिक खर्च लगभग शून्य हो जाता है।
- स्वास्थ्य लाभ: पारंपरिक चूल्हे या धुआं वाले ईंधन की तुलना में कम धुआं, जिससे महिलाओं और बच्चों की सांस संबंधी समस्याएं कम होती हैं।
- जैविक खाद: प्लांट के अवशेष से तैयार खाद मिट्टी की गुणवत्ता सुधारती है और फसल उत्पादन बढ़ाने में मदद करती है।
- पर्यावरण संरक्षण: गोबर का सही प्रबंधन होने से खुले में गोबर सड़ने से होने वाले प्रदूषण में कमी।
अंतिम बात
यह मॉडल दिखाता है कि कैसे सरकारी योजनाएं, संस्थागत सहयोग (जैसे NDDB) और स्थानीय संसाधनों को जोड़कर ठोस परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। महिलाओं की भागीदारी से न केवल उनकी आय बढ़ रही है, बल्कि परिवारों में निर्णय लेने की उनकी भूमिका भी मजबूत हो रही है। गोबर आधारित बायोगैस का उपयोग बड़े स्तर पर अपनाए जाने से राष्ट्रीय स्तर पर भी एलपीजी आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। साथ ही, यह पशुपालन से जुड़े अपशिष्ट प्रबंधन का एक बेहतर तरीका साबित हो रहा है।
गोरखपुर की ये महिलाएं साबित कर रही हैं कि छोटे-छोटे कदम, जब संगठित रूप से उठाए जाएं, तो बड़े बदलाव ला सकते हैं। दूध से आय और गोबर से गैस — यह समीकरण न केवल आर्थिक है, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय रूप से भी सार्थक है।
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